जब सुप्रीम कोर्ट ने हाईवे शराबबंदी पर उठाया था सवाल

जब सुप्रीम कोर्ट ने हाईवे शराबबंदी पर उठाया था सवाल

नई दिल्ली:  
उच्चतम न्यायालय ने 31 मार्च, 2017 को राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों पर 500 मीटर के आसपास शराब विक्रेताओं पर प्रतिबंध लगाने के अपने आदेश में आंशिक रूप से संशोधन किया, लेकिन रेस्तरां और होटलों को कोई राहत देने से इनकार कर दिया.

भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और एलएन राव (अब सेवानिवृत्त) ने बोला कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और सड़क उपयोगकर्ताओं को नशे में वाहन चलाने के खतरे से और शराब के व्यापार के बीच संतुलन बनाना होगा.

इसने कहा, राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों पर शराब की बिक्री की नुकसानदायक प्रकृति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. नशे में वाहन चलाना सड़क दुर्घटनाओं में मृत्यु और चोटों का एक प्रमुख कारण है.

आलोचकों ने बोला कि न्यायालय का आदेश सुविचारित था, हालांकि यह न्यायिक कानून बनाने का एक संदिग्ध रूप था, जिसने राजस्व सृजन को हानि पहुंचाया. न्यायालय के आदेश ने आलोचकों को यह प्रश्न भी खड़ा कर दिया कि क्या यह विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों के पृथक्करण के बुनियादी संवैधानिक सिद्धांत का उल्लंघन है.

15 दिसंबर 2016 को, शीर्ष न्यायालय ने राष्ट्रीय और राजमार्गों के बाहरी किनारे या एक सर्विस लेन से 500 मीटर की दूरी पर शराब की बिक्री के लिए लाइसेंस देने पर रोक लगा दी थी. हालांकि, मेघालय और सिक्किम को इस आदेश से छूट दी गई थी.

मार्च 2017 में, आदेश को संशोधित करते हुए, शीर्ष न्यायालय ने कहा: हम तदनुसार निर्देश देते हैं कि निम्नलिखित अनुच्छेद 15 दिसंबर 2016 के निर्णय में इस कोर्ट के संचालन निर्देशों के पैरा 24 में निर्देश (5) के बाद डाला जाएगा, अर्थात 20,000 लोगों या उससे कम जनसंख्या वाले क्षेत्रीय निकायों में शामिल क्षेत्रों के मुद्दे में, 500 मीटर की दूरी को घटाकर 220 मीटर कर दिया जाएगा.

यह साफ था कि शीर्ष न्यायालय ने सड़क उपयोगकर्ताओं को शराब पीकर वाहन चलाने के खतरे से बचाने और राज्य के हितों की रक्षा के लिए जनहित में काम किया. हालांकि, कई लोगों ने इसे न्यायपालिका के शासन के क्षेत्र में कदम रखने के रूप में देखा.

2017 में, आवेदकों ने तब तर्क दिया था कि शीर्ष न्यायालय द्वारा नियुक्त जानकार समिति (उच्चतम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस राधाकृष्णन की अध्यक्षता में) ने राजमार्गों के संदर्भ में 100 मीटर की दूरी की सिफारिश की थी. हालांकि, शीर्ष न्यायालय ने कहा: हमारा विचार है कि राजमार्ग के संदर्भ में 100 मीटर की दूरी यह सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि राजमार्ग के उपयोगकर्ता राजमार्ग के करीब शराब की बिक्री तक पहुंच नहीं चाहते हैं. सिर्फ 100 मीटर की दूरी से उस उद्देश्य की पूर्ति नहीं होगी जिसे हासिल करने की मांग की गई है.

हालांकि न्यायालय ने शराब पीकर वाहन चलाने के खतरे पर जोर दिया, लेकिन इस निर्णय ने लाखों लोगों को रोजगार देने वाले हजारों वैध व्यवसायों को प्रभावित किया. उदाहरण के लिए गुरुग्राम राजमार्ग के किनारे फला-फूला है और जिसमें कई रेस्तरां, बार और होटल हैं, जो पर्यटकों और युवाओं के बीच बहुत लोकप्रिय है, और हजारों लोगों के लिए रोजगार भी पैदा करता है – इस निर्णय के कारण सबसे अधिक हानि हुआ.

शहर के कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुए और कई बार और होटल बंद हो गए. आलोचकों ने तर्क दिया कि शराब पीकर वाहन चलाने की परेशानी का मुकाबला कारगर पुलिसिंग द्वारा किया जा सकता है, जो कि राज्य के अधीन है, और शीर्ष न्यायालय के इस तरह के आदेशों से व्यवसायियों को हानि होता है, नौकरियों पर असर पड़ता है, और राज्य गवर्नमेंट के राजस्व में भी कमी आती है.

न्यायपालिका या विधायिका की ओर से पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने से परेशानी और बढ़ जाती है.

8 मई, 2020 को, कोरोनवायरस की पहली लहर के दौरान, उच्चतम न्यायालय ने कोरोनोवायरस लॉकडाउन के बीच में शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने का आदेश पारित करने से इनकार कर दिया, जिससे राज्यों में बड़ी भीड़ उमड़ पड़ी.

शीर्ष न्यायालय ने सुझाव दिया कि राज्य सरकारों को शराब की दुकानों पर भीड़भाड़ को रोकने के लिए शराब की औनलाइन बिक्री या होम डिलीवरी पर विचार करना चाहिए.