सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ED सीबीआई से ज्यादा ताकतवर जांच एजेंसी बनी ,1956 में हुई थी प्रवर्तन निदेशालय की स्थापना

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद  ED सीबीआई से ज्यादा ताकतवर जांच एजेंसी बनी ,1956 में हुई थी प्रवर्तन निदेशालय की स्थापना

ED यानि प्रवर्तन निदेशालय पर उच्चतम न्यायालय के निर्णय से साफ है कि दुनिया में फैले मनी लॉन्ड्रिंग, ड्रग्स, आतंकवाद, क्रिप्टो, साइबर वित्तीय क्राइम और हवाला कारोबार के जहर से हिंदुस्तान को बचाने के लिए कठोर और कड़े कानून जरुरी हैं आवश्‍यकता इस बात की है कि इन अधिकारों का कानून के दायरे में उपयोग हो जिससे प्रवर्तन निदेशालय की विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़े ना हों

पश्चिम बंगाल में ममता गवर्नमेंट के मंत्री और उनकी स्त्री सहयोगी के यहां से नोटों का भंडार मिलने के बाद करप्ट नेता, अफसर और व्यापारियों में प्रवर्तन निदेशालय का खौफ बढ़ गया है दूसरी तरफ जांच एजेंसियों के सियासी उपयोग के भी आरोप लग रहे हैं दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टेबलिशमेंट कानून 1946 के अनुसार CBI को राज्यों की गवर्नमेंट से विशेष अनुमति की दरकार होती है दूसरी तरफ कानूनी अधिकारों पर उच्चतम न्यायालय की मोहर के बाद प्रवर्तन निदेशालय राष्ट्र की सबसे शक्तिशाली जांच एजेंसी बन गई है

ED यानि प्रवर्तन निदेशालय की स्थापना 1956 में हुई थी विदेशी मुद्रा से सम्बन्धित अपराधों को रोकने के लिए 1973 में फेरा और 1999 में फेमा कानून बना था उन कानूनों के ख़त्म होने के बाद हवाला और मनी लॉन्ड्रिग जैसे आर्थिक अपराधों के विरूद्ध प्रवर्तन निदेशालय पीएमएलए (PMLA) कानून 2002 के अनुसार कार्रवाई करती है इसमें यूपीए शासनकाल में अनेक बड़े संशोधन किए गए और फिर मोदी गवर्नमेंट ने 2018 में पीएमएलए कानून में अनेक संशोधन किए इन संशोधनों को 243 से अधिक याचिकाओं के माध्यम से उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई जस्टिस खानविलकर की अध्यक्षता वाली 3 जजों की बेंच ने इन सभी मामलों का निपटारा करते हुए 545 पेज का निर्णय देकर प्रवर्तन निदेशालय के सभी अधिकारों को बहाल रखा है प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारों के बारे में अहम निर्णय को इन 6 प्वाइंट्स में समझा जा सकता है-

    • ईडी में ईसीआईआर के अनुसार दर्ज मामला एफआईआर नहीं- प्रवर्तन निदेशालय में ईसीआईआर (इनफोर्समेंट मुकदमा इनफार्मेशन रिपोर्ट) के अनुसार मामला दर्ज किया जाता है सीआरपीसी की धारा-154 के अनुसार पुलिस में एफआईआरदर्ज होती है, जिसकी कॉपी अभियुक्त और उसके परिजनों को मिलना महत्वपूर्ण है इस निर्णय के मुताबिक ईसीआईआर को एफआईआर नहीं बताया जा सकता इसलिए उसकी कॉपी अभियुक्त को देना महत्वपूर्ण नहीं है
    • समन के बाद हिरासत और गिरफ्तारी का अधिकार- केन्द्र गवर्नमेंट ने उच्चतम न्यायालय के सामने दलील दी कि सबूतों के बात ही प्रवर्तन निदेशालय में गिरफ्तारी होती है इसलिए ईसीआईआर दर्ज करने के बाद आरोपी को हिरासत में लेने का प्रवर्तन निदेशालय को अधिकार है उसके मुताबिक उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया है जिसके मुताबिक समन की कार्यवाही के दौरान भी प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारी आरोपी शख्स को हिरासत में ले सकते हैं
    • ईडी के सामने दिया गया बयान,कोर्ट में साक्ष्य के तौर पर मान्य- उच्चतम न्यायालय के मुताबिक प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारी पुलिस विभाग से अलग हैं उनके द्वारा धारा-50 के अनुसार दर्ज बयान संविधान के अनुच्छेद-20 (3) के दायरे में नहीं आता संविधान के मुताबिक किसी को स्वयं के विरूद्ध गवाही देने के लिए विवश नहीं किया जा सकता एविडेंस एक्ट की धारा-25 के अनुसार पुलिस ऑफिसरों के सामने दिए गए इकबालिया बयान की सबूत के तौर पर मान्यता नहीं होती लेकिन इस निर्णय के बाद प्रवर्तन निदेशालय ऑफिसरों के सामने दिए गए बयान को न्यायालय के सामने सबूत केतौर पर बताया जा सकता है
    • जब्ती, गिरफ्तारी और छापेमारी का अधिकार- पुलिस की जांच सीआरपीसी कानून के अनुसार होती है लेकिन प्रवर्तन निदेशालय को गैर कानूनी संपत्ति की जब्ती, गिरफ्तारी और छापेमारी के लिए पीएमएलए कानून के अनुसार विशेषअधिकार हासिल हैं उच्चतम न्यायालय ने इन अधिकारों पर अपनी मोहर लगा दी है जिसके बाद प्रवर्तन निदेशालय राष्ट्र की सबसे ताकतवर जांच एजेंसी बन गई हैै न्यायालय के मुताबिक मनी लॉन्ड्रिंग में लिप्त लोगों की संपत्ति की जब्ती और कुर्की के लिए प्रवर्तन निदेशालय ऑफिसरों को हासिल अधिकार संवैधानिक तौर पर वैध हैं
    • संपत्ति की वैधता को साबित करना अभियुक्त की जिम्मेदारी- संवैधानिक प्रबंध के मुताबिक न्यायालय से दोषी करार होने तक हर आदमी को बेगुनाह माना जाता है इसलिए कानूनी प्रबंध के मुताबिक पुलिस के मामलों में  अभियुक्त के विरूद्ध अभियोजन पक्ष को आरोपों को सिद्ध करना पड़ता है लेकिन पीएमएलएकानून की धारा-24 के अनुसार अभियुक्त को ही यह साबित करना पड़ता है कि जांच केदौरान मिला धन कानूनी तौर पर वैध है क्राइम की आय से जुड़ी सम्पत्ति को छुपाना, अतिक्रमण करना, अधिग्रहीत करना या फिर उसे बेदाग सम्पत्ति के रुप में पेश करना भी गम्भीर क्राइम है जिसके लिए ऐसी सभी सम्पत्ति की जब्ती हो सकती है ऐसा साबित नहीं करने पर जांच एजेंसी उसे बरामद कर सकती है
    • एक क्राइम में दोहरी सजा औरजमानत की कड़ी शर्त- पीएमएलए कानून के अनुसार एक क्राइम में दोहरी सजा हो सकती है न्यायालय के निर्णय से धारा-45 के अनुसार जमानत के लिए दोहरी शर्त का कानून बरकरार है इस कानून के अनुसार जमानत के मुद्दे में पहले सरकारी लोक अभियोजक यानि पब्लिक प्रोसिक्यूटर का पक्ष सुनना जरुरी है अभियुक्त को जमानत तभी दी जा सकती है जब  हो जाए कि आरोपी दोषी नहीं है और रिहाई होने पर वह दोबारा क्राइम नहीं करेगा

अभियुक्तों की अंतरिम राहत को चार सप्ताह के लिए जारी रखते हुए उच्चतम न्यायालय ने सम्बन्धित उच्च न्यायालय को मुद्दे को डिसाईड करने के लिए आदेश दिया है उच्चतम न्यायालय के निर्णय से साफ है कि दुनिया में फैले मनी लॉन्ड्रिंग, ड्रग्स, आतंकवाद, क्रिप्टो, साइबर वित्तीय क्राइम और हवाला कारोबार के जहर से हिंदुस्तान को बचाने के लिए कठोर और कड़े कानून जरुरी हैं उच्चतम न्यायालय ने यह भी बोला कि पीएमएलए अपीलीय ट्रिब्यूनल से लोगों को जल्द न्याय नहीं मिल रहा, जिसे ठीक करने के लिए सदस्यों और स्टॉफ की जल्द भर्ती जरुरी है पीएमएलए कानून में संशोधनों को वित्त विधेयक के तौर पर पारित किया गया थाइसकी संवैधानिकता पर सुनवाई के लिए पूरे मुद्दे को सात जजों की संविधान पीठ को रैफर कर दिया गया है

सुप्रीम न्यायालय की तीन जजों की बेंच ने इस कानून में किए गए संशोधनों की वैधता को इस आधार पर स्वीकार किया है कि धनशोधन आर्थिक क्राइम होने के साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है पीएमएलए कानून के अनुसार दर्ज मामलों की संख्या में कई गुना बढ़ोत्तरी हो गई है लेकिन सजा की रेट काफी कम है जरुरत इस बात की है कि इनअधिकारों का कानून के दायरे में उपयोग हो जिससे प्रवर्तन निदेशालय की विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़े ना हों उच्चतम न्यायालय के निर्णय के मुताबिक कानून का बेजा उपयोग ना हो