कजरी तीज की परंपरा सिर्फ जलेबा खाने तक गई सिमट

कजरी तीज की परंपरा सिर्फ जलेबा खाने तक गई सिमट

वाराणसी. भाद्रपद की तृतीया तिथि मौजूदा दौर में केवल जलेबा खाने तक सीमित रह गयी, जबकि पांच दशक से पहले यह पूर्वांचल में लोकपर्व का दर्जा रखती थी. जनभागीदारी के इस उत्सव में मिर्जापुर से बलिया के बीच कजरी के विराट दंगल हुआ करते थे. लेकिन अब कजरी दंगल के नाम पर रस्मअदायगी हो रही है.

भोजपुरी के शीर्ष रचनाकार पं हरिराम द्विदेदी बताते हैं कि अब तो खाटी मिर्जापुर के कुछ हिस्सों को छोड़ दें चौघट्टा का चलन भी नहीं के बराबर रह गया है. तब गांव के हर पुरवे की महिलाएं एक स्थान इकट़्ठा होतीं. ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य, शूद्र का भेद भूल कर महिलाएं एक दूसरे के हाथ में हाथ डाल कर घेरा बना लेतीं. महिलाएं एक दूसरे की कमर में हाथ डाल कजरी, झूला, चौलर आदि नाच-नाच कर गाया करती थीं. बारिश हो चौघट्टा प्रारम्भ हो जाता तो फिर आधी रात के पहले कभी थमता ही नहीं था.

तेज हवाओं के थपेड़ों से जूझते हुए मूसलधार बारिश में भीगते हुए महिलाएं अपनी मौज में कजरी गाया करती थीं. कजरी के दंगल मिर्जापुर से बलिया तक थोक के रेट में हुआ करते थे.

मिर्जापुर का अहरौरा में कजरी के कई अखाड़े थे. रामदेव का अखाड़ा अब भी लोगों को याद है लेकिन साधु का अखाड़ा, घूरे का अखाड़ा, भद्दो का अखाड़ा का नाम लेवा भी कोई नहीं रहा. वहीं मर्दों के बीच तीन खास खेल हुआ करते थे. सबसे लोकप्रिय खेल कूड़ी (लांग जंप)का खेल था. इसके बाद कबड्डी और कुश्ती का नंबर आता था. इस बार कजरी तीज का पर्व 14 अगस्त को पड़ रहा है. इस मौके पर अब भी शहर के चांदपुर क्षेत्र में खो-खो और कबड्डी खेलने की रस्म अदा की जाती है.

रतजगा कर रस-रसीला जलेबा का लिया आनंद
काशीवासियों ने शनिवार को रतजगा किया. रस-रसीला जलेबा जमकर खाया. कजरी तीज की पूर्व संध्या पर शहर के चौक, बांसफाटक, तेलियाबाग, दारानगर, दशाश्वमेध, लक्सा, महमूरगंज, चेतगंज, खोजवां, सोनारपुरा, सुंदरपुर, अस्सी, लंका आदि विभिन्न क्षेत्रों में जलेबा की मौसमी दुकानें सजी थीं. कुछ दुकानदारों ने बताया कि रतजगा के लिए कुछ लोगों ने पहले से एडवांस बुकिंग करा रखी थी. सादा जलेबा 150 रु पये प्रति किलो, गुड़ का जलेबा दो सौ रुपए प्रतिकिलो, पनीर का तीन सौ और देसी घी जलेबा 350 रु रुपये प्रति किलोग्राम तक बिका. विशेश्वरगंज, पांडेयपुर, आशापुर, सारनाथ, कोनिया, राजघाट आदि इलाकों के मंदिरों के बाहर स्त्रियों का गोल घेरा कुछ देर तक परंपरा का निर्वाह किया.

बाबा केदारनाथ के यहां जुटेंगी गवनहारिन
कजरी तीज की रात गौरीकेदारेश्वर मंदिर की चौखट पर गवनहारिनों की टोली की जुटान होगी. कोविड-19 के कारण विगत दो सालों से यह परंपरा नहीं निभाई जा रही थी. अस्सी से आने वाली स्त्रियों की टोली बाबा का मंदिर बंद होने के बाद मध्यरात्रि तक बाबा को कजरी, झूला, चौलर आदि का श्रवण कराती हैं.